Parle-G : पार्ले-जी बिस्किट ने 10 साल से लगातार बनाया इतिहास, जानिए कैसा रहा सफर?

Parle-G : पार्ले-जी बिस्किट ने 10 साल से लगातार बनाया इतिहास, जानिए कैसा रहा सफर?

Parle-G : सुबह की चाय की चुस्कियों के साथ अगर बिस्किट मिल जाए तो उसका मजा दोगुना हो जाता है. बिस्किट एक Parle-G ऐसी चीज है जो बच्चे, बड़े, बुजुर्ग सभी को बेहद पसंद होते हैं. अगर बिस्किट की बात की जाए तो सभी की जुबा पर पहला नाम पारले-जी (Parle-G) का आता है. देश ही नहीं बल्कि पुरी दुनिया में ये बिस्किट बेहद लोकप्रिय है. वहीं पारले-जी भारत का सबसे ज्यादा बिकने वाला बिस्किट भी है.

भारत का शायद हीParle-G  ऐसा कोई घर हो जहां पर पारले जी नहीं आता होगा. आज भी ऐसे कई लोग है जिनकी चाय की शुरुआत पारले जी के साथ ही होती है. सभी ने कभी ना कभी इस बिस्किट का स्वाद लिया होगा. ये बिस्किट बेहद ही सस्ता है उतना ही स्वादिष्ट है|

Parle-G
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पारले जी का इतिहास

पारले जी का इतिहास 82 साल पुराना है. इसकी शुरुआत मुंबई के विले पारले इलाके में एक बंद पड़ी Parle-G पुरानी फैक्ट्री से हुई. साल 1929 की बात है जब एक व्यापारी मोहनलाल दयाल ने इस फैक्टरी को खरीदा. जहां पर उन्होनें कन्फेक्शनरी बनाने का काम शुरू किया. भारत के पहले कन्फेक्शनरी ब्रांड का नाम उसी जगह के नाम पर पड़ा. जब इस फैक्टरी की शुरुआत हुई उस समय इसमें केवल परिवार के सदस्य ही काम करते थे|

इस फैक्ट्री के शुरू होने के 10 साल बाद, 1939 में यहां बिस्किट बनाने का काम आरंभ हुआ। 1939 में, उन्होंने परिवार के इस व्यापार को ऑफिशियल नाम दिया, और ‘पारले प्रोडक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड’ के नाम से बड़े पैमाने पर बिस्किट बनाना शुरू किया गया। सस्ते दाम और उच्च गुणवत्ता के कारण, यह कंपनी तेजी से लोगों के बीच मशहूर हो गई। उस समय, पारले बिस्किट का नाम ‘पारले ग्लूको’ था।

1947 में भारत को स्वतंत्रता प्राप्त होने के बाद, अचानक देश Parle-G में गेहूं की कमी हो गई। इसके कारण, पारले को अपने ग्लूको बिस्किट का उत्पादन बंद करना पड़ा, क्योंकि गेहूं इसका मुख्य स्रोत था। उसके बाद, कुछ समय तक इसका उत्पादन जौ से किया जाने लगा।”

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कभी न कभी आपने पार्ले-जी जरूर खाया होगा, Parle-G पर कभी सोचा है कि इसका यही नाम क्यों रखा गया. पार्ले-जी में जी का मतलब क्या है और पैकेट पर दिखने वाला बच्चा कौन है ? जानिए इसकी कहानी|

पार्ले प्रोडक्‍ट्स की स्‍थापना 1929 में हुई थी. तब सिर्फ 12 लोग ही यहां काम करते थे. 1938 में पहली बार बिस्किट तैयार किए गए. बिस्किट का नाम दिया गया, पार्लेज-ग्‍लूको. 80 के दशक के पहले तक इसका नाम यही रहा लेकिन 1981 में कंपनी ने पार्लेज-ग्‍लूको को बदलकर सिर्फ ‘जी’ कर दिया. इस ‘जी’ का मतलब ग्‍लूकोज था. 80 के दशक में यह बि‍स्किट बच्‍चों से लेकर Parle-G बड़ों तक में पॉप्‍युलर हुआ. बच्‍चों द्वारा खास पसंद किया जाने पर कंपनी ने इस ‘जी’ शब्‍द को बदलकर जीनियस कर दिया. हालांकि पैकेट पर पार्ले-जी लिखा रहा|

Parle-G
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पार्ले प्रोडक्‍ट्स

लेकिन तीन नाम सबसे कॉमन रहे. इनमें नीरू देशपांडे, Parle-G सुधा मूर्ति और गुंजन गुंडानिया. लोगों की तरफ से दावा किया गया कि इन्‍हीं तीनों में से कोई एक है जिसके बचपन की तस्‍वीर बिस्किट के पैकेट पर है. इनमें से भी सबसे बड़ा दावा नीरू देशपांडे के नाम को लेकर किया गया.

कई अखबारों में बाकायदा नीरू देशपांडे की फोटो के Parle-G साथ खबर भी छापी गई. कई मीडि‍या रिपोर्टस में दावा किया गया कि यह तस्‍वीर नागपुर की रहने वाली 65 वर्षीय नीरू के बचपन की है. खबरों में बताया गया कि नीरू की यह तस्‍वीर उस समय ली गई जब वो 4 साल की थीं. उनके पिता प्रोफेशनल फोटोग्राफर नहीं थे, इसलिए उन्‍होंने यूं ही फोटो खींची थी और वो  फोटो इतनी बेहतरीन क्‍ल‍िक हुई कि उसे पार्ले-जी की पैकिंग के लिए चुना गया.

यह खबर वायरल होने पर पार्ले प्रोडक्‍ट की ओर से इसका जवाब आया. कंपनी के जवाब से इन अफवाहों पर फुल स्‍टॉप लगा गया. पार्ले प्रोडक्‍ट्स ग्रुप के प्रोडक्‍ट मैनेजर मयंक शाह ने तमाम के तरह के दावों को नकारते हुए कहा कि पैकेट पर दिखने वाला बच्‍चा एक इलस्‍ट्रेशन है. जिसे 60 के Parle-G दशक में बनाया गया था. किसी बच्‍चे की तस्‍वीर को क्लिक Parle-G  करके उसका इस्‍तेमाल नहीं किया गया. इस इलस्‍ट्रेशन को एवरेस्‍ट क्रिएटिव एजेंसी ने तैयार किया था|

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Divya Vachhani

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